abhivyakti
Nov 21st, 2009, 1:18 am [IST] [IST]
21 नवंबर
1517 दिल्ली के शासक सिकंदर लोधी द्वितीय की मृत्यु। 1794 होनोलूलु बंदरगाह की खोज हुई। 1918 बेल्जियम में बारूद से भरी दो ट्रेनों में विस्फोट में 1750 लोगों की मौत। 1947 आजादी के बाद पहली बार डाक टिकट जारी किए गए। 1962 भारत चीन सीमा पर युद्ध के बाद संघर्ष विराम की घोषणा। 1963 केरल के थुंबा स्थित प्रक्षेपण केंद्र से, राकेट के...
चंद हाथों तक सीमित न रहे आर्थिक समृद्धि
एक अच्छी खबर है कि ‘गरीब देश’ भारत में अमीरों की संख्या बढ़ रही है। विश्वप्रसिद्ध पत्रिका ‘फोब्र्स’ की मानें तो एक साल के भीतर हमारे मेहनतकश उद्योगपतियों की कमाई दोगुनी हो गई है। अब भारत में अरबपति लोगों व औद्योगिक घरानों की संख्या भी 52 हो गई है। यह संख्या पिछले वर्ष 27 थी। भारतीय अरबपतियों की संख्या में इजाफा उस दौरान हुआ है, जब विश्वभर में आर्थिक मंदी छाई हुई थी और संपत्ति के बढ़ने के कोई ठोस कारण नहीं थे।
बावजूद इसके सेंसेक्स ने बढ़त बरकरार रखी, जिससे मुकेश अंबानी की सकल आर्थिक शक्ति या उनकी संपत्ति का मूल्य दोगुना होकर लगभग 32 अरब रुपए हो गया। फोब्र्स के अनुसार पहले सौ भारतीयों में छह महिलाएं भी हैं, जो विभिन्न व्यवसायों से जुड़ी हैं जैसे सावित्री जिंदल, किरण शॉ मजूमदार, इंदू जैन, अनु आगा और शोभना भरतिया।
इन उद्योगपतियों की प्रगति की दौड़ को भारत की प्रगति से जोड़ा जाना जरूरी है। भारतीय अर्थव्यवस्था नई ऊंचाइयों की ओर जाने के लिए तैयार है, पर सकल घरेलू उत्पाद जिस रफ्तार से आगे बढ़ना चाहिए, नहीं बढ़ा है। आज भी विकास दर 6.5 प्रतिशत के आसपास ही हैं, जबकि इससे ज्यादा की अपेक्षा रही है।
शेयर बाजार की तेजी के चलते भले ही इन उद्योगपतियों की आर्थिक सेहत बेहतर हो गई हो, समाज के उत्थान में भी वह प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से परिलक्षित होना जरूरी है। अर्थात जिस संपदा का निर्माण इन बड़े उद्योग समूहों और उनके कप्तानों के जरिए हो रहा है, उससे आम आदमी की संपन्नता भी यदि बढ़ती है तो ‘इंडिया’ और ‘भारत’ की बढ़ती खाई पाटी जा सकती है।
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