Madhurima
पिछले सप्ताह शकर में मंदी रही। मगर इस बार सप्ताह की शुरूआत अच्छी रही। शकर में दस रूपए के उछाल के साथ ही बाज़ार में मज़बूती आई।’ बाज़ार वाले पृष्ठ के इस समाचार को पढ़ते हुए उसने सोचा-‘तो दाम वृद्धि का दूसरा नाम ही बाज़ार की मज़बूती है।’
 
उलझन
साहित्य
छुटपन की यादें कैसी थीं, यह सवाल पूछते ही, हल्की-हल्की झुर्रियों के बीच मिचमिचाती आंखें जाने किन गलियों-मैदानों में खो जाती हैं। आम की मिठास और बेर के खट्टे-मीठे स्वाद जैसी यादों का सिलसिला चल पड़ता है। ढेर सारी दोस्तियां, कच्चे आंगन-पक्के मन, मनमौजी दौर, चूल्हे की रोटियों की खुशबू, खेलों में कच्ची रोटी की अहमियत..और पता नहीं क्या-क्या। आप भी साथ चलिए न, उन राहों पर जहां बचपन साइकिल के टायरों को डंडी से हांकता सरपट भागता था.. आज से पचास-साठ साल पहले का बचपन। अल्हड़ भोला, आडम्बरों से रहित, सीधा-सादा। हम बच्चे आधी-आधी रात तक लुक-छिप जाना खेलते थे। मिट्टी में नंगे पांव, न चोट लगती थी, न कभी बीमार होते थे। खुलकर स्वाभाविक हंसी हंसते थे। दुखों की दुनिया से अनजान, कोई झमेला नहीं, बस मेला ही मेला। आज भी वहीं मौजूद है वह नीम का पेड़, उसकी वह डाल, जिस पर पींग बढ़ाते जाते थे, नभ को...
घर में कदम रखते ही, ‘मम्मी भूख लगी है, आज खाने में क्या है?’ इस प्रश्न से आपको भी रोज़ाना दो चार होना पड़ता होगा। आपकी सहायता के लिए इस बार हम आपके लिए लाए हैं कुछ ऐसे ही व्यंजन, जो झटपट तैयार होने के साथ बेहद स्वादिष्ट भी है। आप जिसे भी यह परोसेंगी, वह इसका स्वाद कभी भूल नहीं...
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बात 1976 की गर्मी की छुट्टियों की है। मेरे पतिदेव के पास छुट्टी न होने के कारण मैं अपनी ममिया ननद को उसके माता-पिता के पास छोड़ने के लिए लिंबडी (गुजरात) गई थी। लिंबडी में झांसी से मेरी मौसेरी ननद सपरिवार द्वारिका जा रहे थे, चूंकि मैंने भी द्वारिकाधीश के दर्शन नहीं किए थे, सो उन लोगों के आग्रह पर मैं भी साथ जाने तैयार हो गई।



हम लोग शाम को वहां से पैंसेजर ट्रेन में बैठे, जो सीधे दूसरे दिन द्वारिका पहुंचाती थी। बाकी रिश्तेदारों के पास प्रथम श्रेणी का पास था और मेरे पास दूसरे दर्जे का टिकट, इस कारण मुझे उनसे अलग लेडीÊा डिबे में बैठना पड़ा। गाड़ी छोटे-छोटे स्टेशनों पर रुकती...

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ज़िंदगीनामा

 

गुज़रे बचपन की यादें कितनी सुहानी होती हैं, यह आपके अनुभवों से पता चला। आपकी हर याद, जो बचपन से जुड़ी थी, अनोखी थी। लगा जैसे फिर वह बचपना, फिर वही छुटपन लौट आया। कुछ ऐसे ही अनुभवों को हम प्रस्तुत कर रहे हैं, जिन्हें पढ़कर लगता है कि फिर एक बार आंधियों से अमियां चुराएं, चोट के निशां छुपाएं और बाबूजी या बड़े भैया के हाथ से मार खाएं। आप भी पढिए- **************************** काफी हुआ ‘शोर’ बचपन की बात हो, तो 35 साल पुरानी एक घटना याद आती है। मैं अपनी दादा-दादी की लाड़ली थी। दादी के पास ही सोना, खेलना होता था और मैं अपनी बचत के रुपए-पैसे भी उन्हीं को देती थी। हां, जब कुछ नई चीज़ मंगवानी होती थी, तो दादाजी से कहती थीं, क्योंकि वे पिताजी से कहकर तुरंत मंगवा देते थे। उनके स्नेहमयी लाड़-प्यार और डांट-फटकार के दिन आज भी स्मृति के खूबसूरत पन्नों में दर्ज हैं। उन्हें भुलाया नहीं जा सकता। एक बार मैं और मेरी बड़ी बहन घर वालों को बिना बताए अपने स्कूल की अध्यापिकाओं के साथ ‘शोर’ फिल्म देखने चले गए। जब घर वापस आए तो देखा, दादाजी आगंन में ही छड़ी लिए बैठे हैं। कांपते-कांपते जैसे ही घर में दाखिल हुए,...