Dainik Bhaskar

महंगाईMonday, February 22, 2010 09:19 [IST]

रघुवीर अपने बीमार बच्चे के लिए फल खरीदने के लिए आया था। फलों के बढ़े हुए दाम सुनकर मन ही मन सोच रहा था, ‘क्या लूं और क्या न लूं? लूं भी कुछ या न लूं? लेना तो पड़ेगा थोड़ा बहुत शंकर के लिए। कितनी महंगाई हो गई है? फलों के दाम भी कहां से कहां पहुंच गए हैं?’ तभी एक अमीर महिला कार से उतरी। उसने बिना दाम पूछे एक किलो बढ़िया सेब और एक दर्ज़न बढ़िया केले खरीदे और पांच सौ रुपए का नोट निकालकर दुकानदार...
 
 
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संवेदनाFriday, February 05, 2010 12:10 [IST]

ज्यों ही बस बाएं-दाएं डिगती, वह अपने गोद के बच्चे के साथ उसी तरफ झुककर लगभग गिरने को होती। अभी गांव के स्टैंड से वह बस में चढ़ी थी। उसकी याचक दृष्टि सीट पर बैठे हर यात्री से थोड़ी जगह मांग रही थी। बस का डंडा पकड़े वह कभी सीधे खड़े रहने का प्रयत्न करती, कभी बीमार व कमज़ोर बच्चे का रोना सुनकर उसे कंधे से चिपकाए रखने की कोशिश करती। बस अगले स्टैंड पर रुकी। कुछ यात्री और चढ़े। ‘ओ हो, आइए शर्मा...
 
 
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ज़िम्मेदारीFriday, February 05, 2010 12:06 [IST]

समय भले ही बीत जाए, हमारी ज़िम्मेदारियां नहीं बदलतीं। बस उन्हें समझना होता है। हर सुबह हंगामा होता था। तीन वर्ष की शुचि को स्कूल भेजना एक युद्ध के समान था। उसके माता-पिता नौकरी पर निकल जाते थे। घर में रह जाते थे दादा और दादी। दादा डॉक्टर थे। सो सुबह से ही मरीज़ों में व्यस्त हो जाते थे। बेचारी दादी किसी तरह शुचि को तैयार करके स्कूल भेजतीं। समय बीतता गया। शुचि बड़ी होने लगी। दादी बूढ़ी...
 
 
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योग्यताFriday, February 05, 2010 12:07 [IST]

वो समय चला गया जब नौकरी पाने के लिए अच्छी डिग्री और कार्यानुभव देखा जाता था, अब कुछ और शर्ते शामिल हो गईं हैं..। कई वर्षो तक सरकारी अस्पतालों में नर्सिग का कार्य करते हुए उसे ऊब होने लगी थी। वहां की अव्यवस्थाएं और कार्यशैली से वह दुखी रहने लगी थी। उसकी दिली इच्छा थी कि उसे किसी नए प्राइवेट नर्सिग होम में कार्य करने का अवसर मिले। नए-नए खुलने वाले प्राइवेट नर्सिग होम की भव्यता, साज...
 
 
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नकलचीFriday, February 05, 2010 12:06 [IST]

बात उन दिनों की है जब ‘स्वाइन फ्लू’ आम लोगों में इस कदर हावी हो चुका था, मानो मौत उनके सिर पर मंडराने लगी हो। तभी तो हर कोई, हर कहीं मुंह नाक पर कपड़ा ढंककर उससे बचाव का रास्ता खोजने की तलाश में था। उस ट्रेन में यात्रियों की भीड़ खचाखच, पैर रखने में भी दिक्कत हो रही थी। चार महिलाएं साड़ी का दुपट्टा बनाकर मुंह-नाक ढांके थी। आंखें बंद, आराम की मुद्रा में..! और जब जैसे ही गोलकपुर स्टेशन आया।...
 
 
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नया सालWednesday, January 13, 2010 23:10 [IST]

उनकी निगाहें 31 के खांचे पर टिक गईं। ‘कैसे बीत गया जीवन का इतना लंबा कालखंड! पहले छोटे थे, माता-पिता के सहारे पले, फिर खुद माता-पिता बन गए। बड़े हो गए। एक पीढ़ी गई, मैं अधेड़ हो गया और नई पीढ़ी तैयार हो गई। भगवान! अगले साल सेवा-निवृत्त हो जाउंगा इसलिए इस साल बेटे की नौकरी लगा देना और बिटिया का विवाह करा देना! पूरा जीवन घर, परिवार और नौकरी की भागमभाग में ही गुज़र गया। ज़रा भी चैन नहीं मिला! ये...
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सच्ची-मुच्चीThursday, December 31, 2009 10:57 [IST]

नई-नई आई वह रोगिणी मेरे परामर्श कक्ष से जाने लगी, तो उसने मुड़कर मुझे अजीब सी नजरों से देखा। ‘क्या हुआ..?’ मैंने पूछा। ‘कह नहीं सकती!’ वह बोली- ‘मैं निर्धारित समय से पांच मिनट पहले चली आई थी पर आपने मुझे तुरंत भीतर बुला लिया और ढेर-सा वक्त भी दिया। आपने जो-जो हिदायतें दी, उनका एक-एक शब्द मैं समझ गई, आपने दवा की जो पर्ची लिखकर दी है, इसे भी मैं पढ़ सकती हूं!’ अब उसने और गंभीरता से पूछा- ‘आप...
Laghu-katha1
 
 
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सामंजस्यThursday, December 17, 2009 01:01 [IST]

‘सुबह का अखबार रात को आई बारिश और तेज़ अंधड़ की खबरों से भरा पड़ा था। कहीं बिजली के खम्बे गिरे, कहीं पेड़ उखड़ गए। कहीं-कहीं मोबाइल के टॉवर भी धराशायी हो गए। ‘ग़ज़ब है यार, इतने पेड़ गिरे कि सभी रास्ते रुक गए।’ ‘हां यार, फिर भी ये आंधियां आजकल पहले जैसी नहीं है। पहले कैसी, काली, पीली, लाल आंधियां आती थी। चार-चार दिनों तक हाथ को हाथ नहीं सूझता था।’ ‘तो क्या आजकल की आंधियां •यादा ताकतवर...
balance-in-life1
 
 
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थपकी वाली रोटीThursday, December 17, 2009 00:58 [IST]

घर में मेहमान आया। घर के सदस्यों द्वारा आदर-सत्कार हुआ। एक ने आकर राम-राम की। दूसरे ने पानी पिलाया। तीसरे ने कुशलक्षेम पूछी। दिन अस्त होने को आया। अंधेरा घिर आया। रात पड़ने लगी। खाने की तैयारियां शुरू हो गईं। घर में छह प्राणी थे। कमाने वाला एक ही था। सुबह कमाता, शाम को सब खाते। रोटियां बननी शुरू हुईं। रोटियों की खुशबू से घर में सोए मेहमान की भूख भड़क उठी। सोया-सोया सुनता रहा रसोई...
Short-story1
 
 
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कौन नादान?Thursday, December 17, 2009 00:55 [IST]

रवि और शशि का विवाह हो गया। ससुराल में शशि का स्वागत खुशनुमा माहौल में हुआ। जब विवाह में आए मेहमानों का जमघट खत्म हुआ, तो शशि की सास शशि से बोली- ‘मेरे कलेजे के टुकड़े को तुम्हें सौंप रही हूं। अब उसकी देखभाल का ज़िम्मा तुम्हारा होगा।’शशि को कुछ मज़ाक सूझा पर नई दुल्हन थी, सो चुप रही। पर मन ही मन हंसी कि वो अपने से उम्र में सात वर्ष बड़े व अनुभवी व्यक्ति को संभालेगी, मानो वो पुरखिन हो और रवि...
innocent1
 
 
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भयThursday, December 17, 2009 00:51 [IST]

वह गांव में रहता था। बहुत खुश था। पूरा परिवार एक साथ था। माता-पिता, भाई-बहन सब एक साथ। वह पला-बढ़ा और उच्च शिक्षा ली। फिर नगर में जाकर कम आय की नौकरी करने लगा। एक साइकिल खरीद ली। प्रतिदिन शाम को घर वापस आ जाता था। वह अब भी खुश था। परिवार का उत्तरदायित्व निभा रहा था। उसकी शादी हो गई। इच्छाएं बढ़ीं, तो पांव के लिए उसकी चादर छोटी पड़ने लगी। वह एक नगर से दूसरे नगर में आ गया। आय बढ़ गई। किंतु...
fear1
 
 
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छोटा परिवार सुखी परिवारFriday, November 27, 2009 05:55 [IST]

चौधरी हरज्ञान सिंह ने एक नया ट्रक खरीदा और पेंटर बाबू के पास जाकर बोले- ‘पेंटर बाबू, हमारी नई गड्डी को सिंगार दो।’ पेंटर बोला-‘जी जनाब! कोई विशेष बात लिखनी हो, तो बता दो।’ चौधरी साहब मूंछों पर ताव देते हुए बोले- ‘जय जवान-जय किसान लिखना, छोटा परिवार-सुखी परिवार लिखना और सोनू, मोनू, चीकू, चीनू ते मीनू दी गड्डी ज़रूर लिखना।’ पेंटर उनके छोटे परिवार को देख दंग रह गया।
Laghukatha31
 
 
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उद्देश्यThursday, November 26, 2009 01:55 [IST]

‘कितनी देर कर दी? मैं कब से तुम्हारी राह देख रही थी, दो ही घंटे की तो पूजा है और इसे शुरू हुए आधे घंटे बीत चुके हैं, फिर तुम्हारे यहां बहू भी तो है।’ ‘यही तो रोना है। उसे कितनी बार कहा, आज जल्दी खाना बना देना, मुझे पूजा में जाना है, लेकिन उसके कान पर जूं तक नहीं रेंगती। उसे जब जो करना है वही करती है। आज बैंक का ज़रूरी काम कहकर चली गई। एक घंटे में लौटी। कुछ कहो, तो उल्टा जवाब देगी- ‘दाल-सब्ज़ी तो...
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बौछारThursday, November 26, 2009 01:48 [IST]

वह बड़बड़ाती हुई अपनी अटैची में कपड़े रखती जा रही थी। ‘यह भी कोई ज़िंदगी है, अब मैं इस घर में बिल्कुल नहीं रहूंगी।’ हर समय झगड़ा, तकरार, मन-मुटाव, उसका अब इस माहौल में दम घुटने लगा है, मन विद्रोह करने लगा है। हर बात की हद होती है। कई दिनों से आदित्य देर से आ रहे थे। कल उसने कारण जानना चाहा, तो एकदम से चिल्ला पड़े-‘तुम औरतों की यही बुरी आदत है। ज़रा-सी देर हो जाए, तो पूछ-पड़ताल शुरू कर देती हो।’...
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गुलाब-जामुनThursday, November 26, 2009 01:48 [IST]

गत माह मैं हरियाणा के एक विश्वविद्यालय में आयोजित यूथ फेस्टिवल में एक निर्णायक के तौर पर भाग लेने गया हुआ था। दोपहर का खाना खाते हुए मैंने पंगत के प्रवेश द्वार पर देखा कि एक सात-आठ साल की गरीब लड़की एक ओर खड़ी होकर बड़ी ललचाई नज़रों से मुझे देख रही है। मैं समझ गया कि उसे भूख लगी है। मैं धीरे-धीरे चलता हुआ उसके पास पहुंचा और प्यार से पूछा-‘रोटी खाओगी?’ इस पर उसने मासूमियत से कहा-‘बाबूजी,...
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मज़बूतीSunday, November 15, 2009 19:02 [IST]

पिछले सप्ताह शकर में मंदी रही। मगर इस बार सप्ताह की शुरूआत अच्छी रही। शकर में दस रूपए के उछाल के साथ ही बाज़ार में मज़बूती आई।’ बाज़ार वाले पृष्ठ के इस समाचार को पढ़ते हुए उसने सोचा-‘तो दाम वृद्धि का दूसरा नाम ही बाज़ार की मज़बूती है।’
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डांस कॉम्प्टीशनThursday, October 22, 2009 00:28 [IST]

वे घर लौटे तो पत्नी ने बताया कि सुबह जिस डांस कॉम्पटीशन में भाग लेने के लिए वे सख्त मना कर गए थे, बेटी फिर भी उसमें चली गई। उनकी भृकुटी तन गई। बोले-‘ठीक है दरवाज़ा बंद कर दो। जब वापस आए, तो दरवाज़ा मत खोलना।’



पत्नी ने कुछ कहना चाहा, पर वे गुस्से से बोले, ‘बस!’तभी फोन की घंटी बजी। फोन पर बात करते वक्त उनके चेहरे के भाव बदलने लगे। फिर फोन रखने के बाद बोले, ‘बेटी को डांस...

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एक टोकरी मिट्टीThursday, October 22, 2009 00:23 [IST]

एक गांव के ज़मींदार ने एक वृद्धा का खेत छीन लिया। वृद्ध महिला ज़मींदार के पास गई और हाथ जोड़कर बोली, ‘मैं आपसे खेत मांगने नहीं आई हूं। बस इतनी-सी याचना है कि आप मुझे उस खेत में से एक टोकरी मिट्टी लेने दें। इससे मेरी आत्मा को संतोष मिलता रहेगा।’ ज़मींदार ने कुछ सोचकर कहा, ‘ठीक है, जाओ ले लो।’ वृद्धा खेत की ओर गई। ज़मींदार के मन में चोर समाया था, इसलिए वह भी खेत पर जा पहुंचा। वृद्धा रो-रोकर...
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प्रेमThursday, October 22, 2009 00:16 [IST]

आज मैं विवेक से मिलने गई। हमारे प्यार को घर वालों की सहमति की मुहर लग चुकी थी। विवेक ने शादी के कार्ड बांटने के लिए एड्रेस डायरी मांगी थी। जल्दी-जल्दी में ले जाना भूल गई। विवेक ने आते ही मुझसे पूछा और उदास हो गया। मैंने कई बार उससे सॉरी कहा पर उसने कहा कुछ नहीं। पूरे वक्त वो बुझा-बुझा सा रहा। मैं लगातार उसे हंसाने की कोशिश करती रही पर वो अपने ख्यालों में ही गुम था। घर आते-आते मैंने उससे...
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अन्यायMonday, October 05, 2009 17:11 [IST]

आज ऑफिस में बड़े बाबू शर्माजी बहुत परेशान दिखाई दे रहे थे। किसी भी काम में उनका मन नहीं लग रहा था। लंच में मैंने उनसे पूछ ही लिया-‘बड़े बाबू क्या बात है, आप आज परेशान दिखाई दे रहे हैं। आखिर बात क्या है? क्या बताऊं सर, ये भगवान भी न हमारे जैसे लोगों के साथ अन्याय करता है। अब देखिए न, मेडिकल प्रवेश परीक्षा में मेरी बेटी तो पास हो गई पर बेटा फेल हो गया। बड़े बाबू ने जवाब दिया। पर इसमें...

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