वह बड़बड़ाती हुई अपनी अटैची में कपड़े रखती जा रही थी। ‘यह भी कोई ज़िंदगी है, अब मैं इस घर में बिल्कुल नहीं रहूंगी।’ हर समय झगड़ा, तकरार, मन-मुटाव, उसका अब इस माहौल में दम घुटने लगा है, मन विद्रोह करने लगा है। हर बात की हद होती है।
कई दिनों से आदित्य देर से आ रहे थे। कल उसने कारण जानना चाहा, तो एकदम से चिल्ला पड़े-‘तुम औरतों की यही बुरी आदत है। ज़रा-सी देर हो जाए, तो पूछ-पड़ताल शुरू कर देती हो।’...